Chaitra Shukla Ekadashi-Kamada Ekadashi (चैत्र शुक्ल एकादशी- कामदा एकादशी)

Chaitra Shukla Ekadashi-Kamada Ekadashi ( चैत्र शुक्ल एकादशी- कामदा/फलदा एकादशी )

Date in 2018 - 27 March 2018, Day- Tuesday

Nakshatra- Pushya

Chandra- Cancer(Karka)

 

कामदा एकादशी जिसे फलदा एकादशी भी कहते हैं, श्री विष्णु का उत्तम व्रत कहा गया है। इस व्रत के पुण्य से जीवात्मा को पाप से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली और मनोनुकूल फल देने वाली होने के कारण फलदा और कामना पूर्ण करने वाली होने से कामदा कही जाती है।

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कामदा एकादशी की कथा :

धर्मराज युधिष्ठिर बोले, ” हे भगवान! मैं आपको कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ और निवेदन करता हूँ कि अब आप कृपा करके चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का महात्म्य कहिए|

श्री कृष्ण भगवान बोले, ” हे राजन! यही प्रश्न एक समय राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठ से किया था| राजा दिलीप ने पूछा- गुरुदेव! चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसमे किस देवता की पूजा की जाती है तथा इसकी विधि क्या है? सो कहिए|

महर्षि वशिष्ठ बोले,” हे राजन! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम कामदा है| यह मनुष्य के सब पापों को नष्ट करने वाली है| इसके व्रत को करने से पुत्र की प्राप्ति होती है और कुयोनि छूट जाती है और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है|

श्री कृष्ण बोले,” हे धर्मराज! जो समाधान महर्षि वशिष्ठ ने किया था वही मैं तुमसे कहता हूँ|

प्राचीन काल में रत्नपुर नाम का एक नगर था| वहाँ पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त ऐश्वर्यशाली राजा पुंडरीक़ राज्य करता था| रत्नपुर में अनेक अप्सरा, गंधर्व तथा किन्नर वास करते थे| उसकी सभा में गंधर्व गायन करते थे| , अप्सरायें नृत्य करती थी| उनमे ललिता और ललित नाम के स्त्री पुरुष अत्यंत वैभवशाली भवन में निवास करते हुए विहार करते थे| उन दोनों में अत्यंत स्नेह था यहाँ तक की अलग अलग हो जाने पर दोनो व्याकुल हो जाते थे|

एक समय राजा पुंडरीक़ गंधर्वों सहित एक सभा में क्रीड़ा कर रहे थे| उस सभा में अन्य गन्धर्वों के साथ ललित भी गायन कर रहा था| उसकी प्रियतमा उस समय सभा में उपस्थित नही थी| गाते-गाते उसको अपनी प्रियतमा ललिता का ध्यान आ गया और उसके ध्यान में स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया| वह अशुद्ध गाना गाने लगा| ललित के मान का भाव जानकार नागराज कर्कोट ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया| तब पुंडरीक़ ने क्रोध पूर्वक कहा कि, ” तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है| अतः तू कच्चा माँस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बनकर अपने किए कर्मों का फल भोग|”

पुंडरीक़ के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विकराल राक्षस बन गया| उसका शरीर आठ योजन का हो गया| उसका मुख अत्यंत भयंकर , नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकालने लगी| सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगाने लगे तथा भुजायें अत्यंत लंबी हो गयीं| उसके मुख से दुर्गंध निकालने लगी| इस प्रकार वह राक्षस होकर अनेक प्रकार के दुख भोगने लगा| उसको भोजन मिलना दूभर हो गया, वह भूख से व्याकुल हो गया|

जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह सब वृतांत मालूम हुआ तो वह बहुत दुखी हुई| वह अपने पति के उद्धार के लिए सोचने लगी कि मैं कहाँ जाउँ , क्या यत्न करूँ? वह राक्षस अनेक प्रकार के दुख सहता घने वनों में रहने लगा| उसकी स्त्री भी उसके पीछे-पीछे घूमती विंध्याचल पर्वत पर चली गयी|

वहाँ पर शृंगी ऋषि का आश्रम था| ललिता आश्रम में गयी और विनीत भाव से ऋषि से प्रार्थना करने लगी| मुनि की शरण में जाकर अपने पति के उद्धार का उपाय पूछा|

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उसे देखकर शृंगी ऋषि बोले,” हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किसलिए आई हो?”

ललिता बोली,” हे मुनि! मेरा नाम ललिता है| राजा पुंडरीक़ के श्राप से मेरा पति विशालकाय भयानक राक्षस हो गया है, इसका मुझे बड़ा भारी दुख है| आप राक्षस योनि से छूटने का कोई उपाय बतलाइए, जिससे उनका उद्धार हो|”

शृंगी ऋषि बोले,” हे गंधर्व कन्या! चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है| उसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं| यदि तुम कामदा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्यफ़ल अपने पति को अर्पण कर दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी शांत हो जाएगा|”

मुनि के वचनों को सुनकर ललिता ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देते हुए भगवान से इस प्रकार से प्रार्थना करने लगी,” हे प्रभो! मैने जो यह व्रत किया है, इसका फल मेरे पातिदेव को प्राप्त हो , जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जायें| ”

ललिता ने कामदा एकादशी के व्रत के दिन , रात्रि को जागरण किया, दीप जलाए, प्रभु के गुण गाए, प्रातः ब्राह्मणो को दक्षिणा देकर भोजन खिलाया, फिर उनकी परिक्रमा कर पद-पद से आश्वमेध यज्ञ का फल लिया| ब्राह्मणों के सामने पति के अर्पण संकल्प कर दिया| एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से छूट गया और अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ| फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा| कामदा एकादशी के प्रभाव से वे पूर्व की भाँति सुंदर होकर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चले गये|

वशिष्ठ मुनि बोले,” हे राजन! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं| इसके व्रत से मनुष्य ब्रह्महत्या इत्यादि पाप और राक्षस जैसी योनि से छूट जाते हैं| संसार में इसके बराबर कोई दूसरा व्रत नही है| परोपकारी विष्णु भक्त न केवल अपना जीवन सुधारता है, अपितु भगवान विष्णु की कृपा से अन्य व्यक्तियों का भी कष्ट दूर करता है| हे राजन! कामदा एकादशी का व्रत करने वाला परोपकारी विष्णु भक्त हो जाता है| इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है|”

व्रत विधि:

एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्री विष्णु के विग्रह की पूजन करें। विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करें। आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करें। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजना ग्रहण करें। इस प्रकार जो चैत्र शुक्ल पक्ष में एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामना पूर्ण होती है।

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